आठ साल से बकाया मानदेय के इंतजार में एक लाख शिक्षा प्रेरक, दीपावली से पहले भुगतान की मांग; 398 करोड़ रुपये स्वीकृत होने के बावजूद भुगतान पर सवाल

उत्तर प्रदेश

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के करीब एक लाख शिक्षा प्रेरक पिछले आठ वर्षों से अपने 40 महीने के बकाया मानदेय का इंतजार कर रहे हैं। बार-बार गुहार लगाने और अधिकारियों से आश्वासन मिलने के बावजूद अब तक उन्हें बकाया मानदेय का भुगतान नहीं हो सका है। शिक्षा प्रेरकों ने दीपावली से पहले अपने बकाया मानदेय का भुगतान किए जाने की मांग उठाई है, ताकि वे भी अपने परिवार के साथ त्योहार मना सकें। लेकिन भुगतान में लगातार हो रही देरी के कारण शिक्षा प्रेरकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
शिक्षा प्रेरकों का कहना है कि पिछले आठ वर्षों से वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, संबंधित मंत्रियों और विभागीय अधिकारियों से अपने बकाया मानदेय के भुगतान की मांग कर रहे हैं। हर बार उन्हें जल्द भुगतान किए जाने का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं देती। उनका आरोप है कि साक्षरता विभाग के निदेशक अनिल भूषण चतुर्वेदी की ओर से भी लगातार आश्वासन दिया जा रहा है, लेकिन भुगतान की निश्चित तिथि नहीं बताई जा रही है। इससे शिक्षा प्रेरकों में विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष व्याप्त है।
प्रदेश अध्यक्ष ने निदेशक को पत्र भेजकर दी आंदोलन की चेतावनी
इसी मामले को लेकर उत्तर प्रदेश साक्षरता कल्याण समिति के प्रदेश अध्यक्ष सत्यवान वर्मा ने साक्षरता विभाग के निदेशक अनिल भूषण चतुर्वेदी को पत्र भेजकर शिक्षा प्रेरकों की समस्या से अवगत कराया है। पत्र में कहा गया है कि प्रदेश के करीब एक लाख शिक्षा प्रेरकों का 40 महीने का मानदेय पिछले आठ वर्षों से लंबित है। मानदेय नहीं मिलने के कारण शिक्षा प्रेरक आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष ने मांग की है कि दीपावली से पहले सभी शिक्षा प्रेरकों के बकाया मानदेय का भुगतान कराया जाए। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि निर्धारित समय तक भुगतान नहीं हुआ तो शिक्षा प्रेरक लखनऊ स्थित साक्षरता निदेशालय पर आमरण अनशन और भूख हड़ताल शुरू करेंगे। इस आंदोलन में प्रदेशभर के करीब एक लाख शिक्षा प्रेरकों के शामिल होने की बात कही गई है।
वर्ष 2012 में हुई थी शिक्षा प्रेरकों की नियुक्ति
मालूम हो कि केंद्र सरकार की साक्षर भारत मिशन योजना के तहत वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश की प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक महिला और एक पुरुष शिक्षा प्रेरक की नियुक्ति की गई थी। इनकी नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य 15 वर्ष से अधिक आयु के निरक्षर महिला एवं पुरुषों को साक्षर बनाना था। इसके लिए प्रत्येक शिक्षा प्रेरक को 2,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिए जाने का प्रावधान था। इसमें 1,000 रुपये केंद्र सरकार और 1,000 रुपये राज्य सरकार की ओर से दिए जाने थे।
शिक्षा प्रेरकों ने प्रदेश की ग्राम पंचायतों में निरक्षर लोगों को साक्षर बनाने के लिए कार्य किया। लेकिन 31 मार्च 2018 को साक्षर भारत मिशन योजना अचानक बंद कर दी गई। आरोप है कि योजना बंद करते समय शिक्षा प्रेरकों के 40 महीने का बकाया मानदेय भी भुगतान नहीं किया गया। इसके बाद से ही शिक्षा प्रेरक लगातार अपने मेहनताने की मांग कर रहे हैं।
398 करोड़ रुपये की स्वीकृति के बाद भी भुगतान में देरी क्यों?
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिक्षा प्रेरकों के बकाया मानदेय के भुगतान के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से करीब एक माह पूर्व 398 करोड़ रुपये की धनराशि कैबिनेट से स्वीकृत किए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद शिक्षा प्रेरकों के खातों में भुगतान नहीं पहुंचा है। शिक्षा प्रेरकों का आरोप है कि स्वीकृत धनराशि अभी तक जिलों में संबंधित जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों के खातों तक नहीं भेजी गई है।
विभागीय स्तर पर बताया जा रहा है कि शिक्षा प्रेरकों को मिलने वाले 2,000 रुपये के मासिक मानदेय में आधी धनराशि केंद्र सरकार और आधी राज्य सरकार की हिस्सेदारी थी। वर्तमान में स्वीकृत 398 करोड़ रुपये राज्य सरकार की ओर से उपलब्ध कराए जाने वाली धनराशि है, जबकि केंद्र सरकार की हिस्सेदारी अभी प्राप्त नहीं हुई है। इसी कारण केंद्रांश का इंतजार किए जाने की बात कही जा रही है।
हालांकि, इस स्थिति को लेकर शिक्षा प्रेरकों का सवाल है कि जब राज्य सरकार की ओर से 398 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत कर दी गई है तो उसका भुगतान शुरू करने में देरी क्यों हो रही है? साथ ही पिछले आठ वर्षों में केंद्र सरकार से मिलने वाली लंबित धनराशि की मांग के लिए विभाग की ओर से क्या प्रयास किए गए, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
हर त्योहार उम्मीद और निराशा के बीच गुजर रहा
शिक्षा प्रेरकों का कहना है कि आठ वर्षों से बकाया मानदेय नहीं मिलने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है। दीपावली सहित अन्य त्योहार भी उनके लिए चिंता और निराशा के बीच गुजरते हैं। इस बार भी उन्हें उम्मीद थी कि दीपावली से पहले सरकार की ओर से स्वीकृत धनराशि का लाभ मिल जाएगा, लेकिन भुगतान की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने से उनकी उम्मीदों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रदेश के करीब एक लाख शिक्षा प्रेरकों को उनके 40 महीने के बकाया मानदेय का भुगतान आखिर कब तक किया जाएगा? 398 करोड़ रुपये की स्वीकृति के बाद भी धनराशि जिलों तक क्यों नहीं पहुंची? केंद्र सरकार की लंबित हिस्सेदारी के लिए विभाग ने अब तक क्या कार्रवाई की है? क्या शिक्षा प्रेरकों को इस बार दीपावली से पहले उनका बकाया मानदेय मिल पाएगा या फिर उन्हें एक बार फिर केवल आश्वासन से ही संतोष करना पड़ेगा?
फिलहाल शिक्षा प्रेरक सरकार और विभागीय अधिकारियों से जल्द भुगतान की मांग कर रहे हैं। वहीं, यदि उनकी मांग पूरी नहीं होती है तो लखनऊ स्थित साक्षरता निदेशालय पर आंदोलन किए जाने की चेतावनी दी गई है।

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