जीवन का गुजरता हर लम्हा तन्हा होने का एहसास तो कराता

महराजगंज उत्तर प्रदेश

 

 

सम्पादकीय

चिरागों से अगर अंधेरा दूर होता तो चांदनी की चाहत क्यूं होती !!
कट सकती अगर ये ज़िन्दगी अकेले तो साथी की जरूरत क्यूं होती !!

हकीकत के धरातल पर जब ज़िन्दगी का सच से सामना होता है तब सारे पैमाने बदल जाते हैं! तमाम तरह की विसंगतियों का सानिध्य लिए जीवन का गुजरता हर लम्हा तन्हा होने का एहसास तो कराता है लेकिन बिन संगति दुर्गति का भीअहसास कराता रहता है।मानव जीवन में सुख दुख के तारतम्यता के साथ जो वक्त गुजरता है उसमें जब तक जीवन संगिनी का अहम किरदार शामिल नहीं होता तब तक उस रंग मंच से पर्दा उठता ही नहीं जिसके पीछे वास्तविकता का परिदृश्य समाहित रहता!उम्र का कारवां निरन्तर क्षरित होते हर पल को हस्ताक्षरित करते क्रम बद्धता को समेटे नियमित अग्रसर होता रहता है!

इस भौतिकवादी संसार के विदीर्ण हो चुके ब्यवहार में विकृत किरदार के साथ लम्हा लम्हा आखरी मंजिल के तरफ बढ़ते जाना नियति नियंता का बनाया प्राकृतिक प्राविधान है!

यही तो मालिक अमिट सम्विधान हैं?।सबकुछ बदल जायेगा लेकिन जन्म के बाद मृत्यू का शास्वत नियम कभी नहीं बदलने वाला है! फिर भी नहीं समझते नादान उनके लिए अहम है उनका स्वाभिमान! इस आनी जानी दुनियां के अघोषित अवर्णित अनसुलझे रहस्य को आज तक कोई नहीं समझ सका!अहम के वहम में पल पल गुजारने वाला उस समय लाचार विवस होकर गुजरे कल की यादों में डूब कर आहें भरता है जब तन्हाई ताने मारती, कर्मों की कलाबाजियों का ज्ञान कराती है! युगों युगों से मालिक की सबसे अनोखी संरचना मानव अपनी बुद्धि तथा विवेक से सम्बृध समाज का निर्माण करता आया है‌ मगर अवतरण के बाद से ही माया की महादशा का शिकार होकर अतृप्तता की उस उलझी श्रृंखला का हिस्सा बन जाता है जिसमे वैभव की विशालता समग्रता को अक्षुण्ण बनाए रहती है!

कोई भी इन्सान कभी तृप्त हो ही नहीं पाता!वह उसी अतृप्ता,की चपेट में आकर सम्बन्धों का तिरस्कार कर जीवन को अन्धकार मय बना लेता है!

कितना अज्ञानी मानव तन पाने के बाद जीवात्मा हो जाती है उसका नजारा हर कोई हर रोज देख रहा है!अशान्ती के झंझावाती आवरण में परमधाम जाने तक मृगतृष्णा का शिकार बना लालच लोभ के विकार में अहंकार को धारण कीए खुद के बर्बादी का मंजर तैयार कर लेता है। प्रारब्ध के पारितोषिक में उपलब्ध हर सांस का हिसाब उस मालिक के दरबार में महाप्रयाण के बाद देना ही पड़ता है लेकिन जब तक शारीरिक सौष्ठव में इन्द्रियों का उन्मादी उद्भव उफान पर होता है तब तक उनके सामने हर कोई छोटा होता है! संगति का सदुपयोग विसंगति के साथ दुर्भावना में दम्भ लिए करने वाले का अन्त कभी सन्त के तरह नहीं हो पाता!पता सभी को है साथ कुछ नहीं जायेगा!यह जीवन दुबारा फिर मिलेगा इसकी भी गारंटी नहीं! जब तक सांस का एहसास है उपहास का पात्र बनना कहा की चतुराई है भाई!

जीवन का हर सम्बन्ध मालिक के अनुबन्ध पर टिका है। फिर अपना क्या है!न शरीर साथ जायेगी!न सम्बन्ध साथ निभायेगा! बस जायेगा कर्मों का हिसाब!

मत लिजीऐ किसी की बद्दुआएं, क्यों की आखरी वक्त में सिर्फ दुआएं ही सहारा बनती है। मालिक की अनमोल विरासत‌ मां बाप वह हस्ती है जो गुज़र जाने के बाद जीवन में कभी दुबारा नहीं मिलते! वह महकते चमन के वह फूल हैं जो जीवन में केवल एक बार खिलते!मगर उनके कर्मों के सुगन्ध की गमक उम्र के आखरी पड़ाव तक रहती है!बदलते वक्त मे आज समाज कितना गिर चुका है वृद्धा आश्रम इसके गवाह हैं।

कैलाश सिंह

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