अक्षयबर सिंह ने आजादी के लिए त्याग दिया था सुख-सुविधाओं से भरा जीवन : कृष्ण मोहन सिंह ‘बबलू’

महराजगंज उत्तर प्रदेश

दादा अक्षयबर सिंह ने आजादी के लिए त्याग दिया था सुख-सुविधाओं से भरा जीवन : कृष्ण मोहन सिंह ‘बबलू’

 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अक्षयबर सिंह की संघर्षगाथा को पोते कृष्ण मोहन सिंह ने किया याद, 17 वर्ष की उम्र में आंदोलन से जुड़े थे

 

महराजगंज। देश की आजादी के लिए अपना सुख-सुविधाओं से भरा जीवन त्यागने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अक्षयबर सिंह की संघर्षगाथा आज भी उनके परिवार के लिए गौरव का विषय है। उनके पोते कृष्ण मोहन सिंह ‘बबलू’ ने अपने दादा के संघर्षों को याद करते हुए बताया कि अक्षयबर सिंह ने महज 17 वर्ष की उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन में कदम रखा और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था।

कृष्ण मोहन सिंह ‘बबलू’ के मुताबिक, उनके दादा का मूल निवास गोरखपुर जिले के सिकरीगंज थाना क्षेत्र के आराव जगदीश गांव में था। उन्होंने जूनियर हाईस्कूल तक पढ़ाई की थी। इसी दौरान वह महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए और घर की सुख-सुविधाओं को छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। आंदोलन में सक्रियता का आलम यह रहा कि महज एक वर्ष बाद ही उन्होंने जिला कांग्रेस कमेटी के संचालन की जिम्मेदारी संभाल ली।

अंग्रेजों की यातनाएं भी नहीं डिगा सकीं संकल्प

‘बबलू’ बताते हैं कि आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण अक्षयबर सिंह को अंग्रेजी हुकूमत की सख्ती का सामना करना पड़ा। चौरी-चौरा कांड के बाद अहिंसात्मक आंदोलन में सक्रियता के चलते वर्ष 1929 में उन्हें छह माह के कारावास और अर्थदंड की सजा मिली। अंग्रेजों की लाठियां, जेल और आर्थिक दंड भी उनके हौसले को नहीं तोड़ सके।

 

नमक सत्याग्रह और शराबबंदी आंदोलन में निभाई भूमिका

कृष्ण मोहन सिंह के अनुसार, वर्ष 1931 में अक्षयबर सिंह ने नमक सत्याग्रह, विदेशी कपड़ों पर सील-मोहर के बहिष्कार तथा ताड़ी और शराबबंदी आंदोलन में करीब दो सौ लोगों के साथ सक्रिय भागीदारी की। स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित पुस्तकों में भी उनके इस योगदान का उल्लेख दर्ज है।

 विधानसभा में हिंदी के लिए भी उठाई आवाज

‘बबलू’ बताते हैं कि आजादी के बाद भी उनके दादा राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहे। वर्ष 1948 में विधानसभा की कार्यवाही अंग्रेजी में होने का उन्होंने विरोध किया। उनके प्रयास से विधानसभा की कार्यवाही और सरकारी गजट का प्रकाशन हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में कराने की व्यवस्था हुई।

 दो दशक तक रहे विधानसभा सदस्य

कृष्ण मोहन सिंह ‘बबलू’ के अनुसार, अक्षयबर सिंह वर्ष 1947 से 1967 तक विधानसभा सदस्य रहे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आजादी के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने तक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

कृष्ण मोहन सिंह ‘बबलू’ कहते हैं कि उनके दादा का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने जिस उम्र में व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को त्यागकर देश की आजादी को चुना, वह त्याग और राष्ट्रभक्ति की ऐसी मिसाल है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

 

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