हिन्द सन्देश टाइम्स
कुशीनगर
पूर्व IAS दिव्या मित्तल ने कुछ अपने अंदाज में यह जानकारी दी
13 साल IAS में रहने के बाद उन्होंने खुद कहा जिनकी आवाज दफ्तर तक नहीं पहुंचती, या पहुंच कर भी सुनी नहीं जाती” – मतलब अधिकारी के तौर पर वह जितना बदलाव चाहती थीं, उतना नियम-कानून और राजनीतिक दबाव में नहीं कर पा रही थीं। अधिकारी फैसले को लागू करता है, नेता फैसला बनाता है।
80 साल का हिसाब’ वाला नैरेटिव
यह एक बहुत सोचा-समझा स्लोगन है। 2027 में भारत की आजादी के 80 साल होंगे। वह यह बताना चाहती हैं कि 80 साल बाद भी आम आदमी के बुनियादी सवाल गरीबी, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य वैसे ही हैं। इससे वह खुद को किसी पार्टी से अलग, जनता के मुद्दों वाली नेता के तौर पर पेश कर रही हैं।
अकेले चलने की रणनीति
उन्होंने किसी पार्टी में जाने से मना किया है। इसका मतलब है वह पहले अपनी खुद की छवि और जनाधार बनाना चाहती हैं बाद में किसी बड़े दल से अच्छी डील या अपनी खुद की पार्टी बना सकती हैं यूपी से शुरुआत इसलिए क्योंकि यूपी राजनीति का केंद्र है, यहां से राष्ट्रीय पहचान जल्दी बनती है।
साधारण भाषा में नौकरशाही में रहकर वह सिस्टम को अंदर से देख चुकीं, अब उसे बाहर से, राजनीति के जरिए बदलना चाहती हैं। यह इस्तीफा अचानक नहीं, एक लंबी राजनीतिक प्लानिंग का हिस्सा लग रहा है।