शिव शंभू सिंह
गैस की किल्लत और बढ़ी कीमतों ने गांव-कस्बों में घरों की रसोई में पुराने दिनों की याद दिला दी है। वहां अब लोग मजबूरी में पारंपरिक मिट्टी के चूल्हों पर खाना पका रहे हैं। धुएं वाली रसोई वापस लौट आई है। हालांकि यह रसोई रियायती और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी साबित हो रही है। खडा के गांवो मे नगर पंचायत खड्डाहो या फिर रेता क्षेत्रहाहो घरेलू गैस न मिलने के कारण चूल्हों पर खाना पकाना मजबूरी बन गया है।
चलते ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी-उपले ही एकमात्र सहारा हैं। घरों में पुराने दिनों की याद ताजा हो गयी है। एक दौर था जब घर-घर में लकड़ी और उपलों वाले मिट्टी के चूल्हे जलते थे। मिट्टी के चूल्हे मुख्य रूप से चिकनी मिट्टी, दोमट मिट्टी या तालाब के नीचे की गाद से तैयार किए जाते हैं। इसमें मजबूती के लिए गेहूं या धान का भूसा, रेत, और गोबर मिलाया जाता है। यह मिश्रण चूल्हे को उच्च ताप पर फटने से रोकता है और उसे टिकाऊ बनाता है। चिकनी मिट्टी पानी के साथ मिलकर अच्छी तरह बंधती है अब चूल्हे पर खाना बन रहा है।
मां की रसोई की याद हुई ताजा
नगर पंचायत खड्डा की औरतें बताती बताती हैं कि अब गैस किल्लत ने मां के समय के चूल्हे की याद दिला दी है। एक समय था जब मां चूल्हे पर रोटियां बनाती थीं और हम सब भाई-बहन पिताजी के साथ बैठकर खाना खाते थे। तब बडा आनंद आता था। अब गैस की कमी के चलते वही समय फिर लौटने लगा है। हालांकि मेहनत बढ़ गई है और धुआं भी झेलना पड़ रहा है। नाश्ते से लेकर खाना तक चूल्हे पर ही तैयार करना पड़ रहा है। गैस संकट ने पूरी दिनचर्या बदल दी है और शाम के भोजन की तैयारी भी पहले करनी पड़ रही है। इसके कारण घर के अन्य काम भी प्रभावित हो रहे है और समय का संतुलन बिगड़ जारहा है।